यूँ न चेहरे पे रौनक बिछाये हुये हैं,
हम फ़रिश्तों की बस्ती से आये हुये हैं !

यूँ न चेहरे पे रौनक बिछाये हुये हैं,
हम फ़रिश्तों की बस्ती से आये हुये हैं !

ये इश्क़ पनपता है अक्सर, कुछ सन्नाटों सी हलचल में।
जब चेहरा भूल न पायें हम, आँखों से यौवन के पल में।…(Aazad)

कहीं दक्कन पठारों से भी कुछ बलखा के आती हैं !
अरावली की पहाड़ी से भी कुछ टकरा के आती हैं !
कोई कह दे पहाड़ों से, समंदर मैं हूँ अपराजेय,
हमें पाने को सब नदियाँ उसे ठुकरा के आती हैं ! (✍🏻Aazad)

