कहीं दक्कन पठारों से भी कुछ बलखा के आती हैं !
अरावली की पहाड़ी से भी कुछ टकरा के आती हैं !
कोई कह दे पहाड़ों से, समंदर मैं हूँ अपराजेय,
हमें पाने को सब नदियाँ उसे ठुकरा के आती हैं ! (✍🏻Aazad)


कहीं दक्कन पठारों से भी कुछ बलखा के आती हैं !
अरावली की पहाड़ी से भी कुछ टकरा के आती हैं !
कोई कह दे पहाड़ों से, समंदर मैं हूँ अपराजेय,
हमें पाने को सब नदियाँ उसे ठुकरा के आती हैं ! (✍🏻Aazad)

