किसी की आँख का मजनूँ, कहीं ख्वाबों की लैला हूँ !
इलाहाबाद कहता है, मैं इक संगम का मेला हूँ !
यहाँ पर ज़िन्दगी अपनी तो बस ‘अंडमान’ जैसी है,
समूचा हिन्द मेरा है, मगर फिर भी अकेला हूँ !…✍🏻Aazad

किसी की आँख का मजनूँ, कहीं ख्वाबों की लैला हूँ !
इलाहाबाद कहता है, मैं इक संगम का मेला हूँ !
यहाँ पर ज़िन्दगी अपनी तो बस ‘अंडमान’ जैसी है,
समूचा हिन्द मेरा है, मगर फिर भी अकेला हूँ !…✍🏻Aazad
